blogid : 12846 postid : 791012

बड़े-बड़े रिपोर्टरों को ऐसे चुनौती दे रही हैं ये ग्रामीण महिलाएं

Posted On: 6 Jun, 2015 social issues में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

किसी ने सही ही कहा है कि एक काम को सफल बनाने के लिए अनुभव ही नहीं बल्कि दीमाग की भी जरूरत होती है. आपके द्वारा वो कार्य पहले कभी किया गया हो या नहीं, लेकिन यदि आपके अंदर उसे कर दिखाने का जज्बा व दीमागी तौर पर समझ है तो आप ना केवल उसे पूरा करेंगे बल्कि उसे ऐतिहासिक भी बनाएंगे. कुछ ऐसा ही कर दिखाया है उत्तर प्रदेश की कुछ ग्रामीण महिलाओं ने जो आज कल के धुरंधर रिपोर्टर भी नहीं कर सकते.


khabar lahariya team and people


40 का दम


उत्तर प्रदेश की मीरा जातव एक अखबार चलाती हैं जिसे चलाने में उनकी 40 ग्रामीण महिलाएं मदद करती हैं. अमतौर पर एक अखबार का संपादक होना या कुछ औरतों द्वारा सारा काम संभालना आज के युग में कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन यूपी की इन महिलाओं ने अपने इस अनुभव को ऐतिहासिक बनाया है.


इन सभी महिलाओं को किसी तरह की तकनीकी जानकारी नहीं है, वे कम्प्यूटर चलाना नहीं जानती और ना ही अखबार बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली मशीनों की सूचना रखती हैं फिर भी हर हफ्ते इनका अखबार हजारों लोगों के घरों तक समय पर पहुंचता है, पर कैसे?


Meera editor


Read More: एड्स पीड़ितों के नाम पर पब्लिक से चैरिटी मांगने का बेहद अश्लील तरीका ढूंढ़ निकाला पोर्न स्टार्स ने..जानना चाहते हैं क्या किया इन नौ बालाओं ने?


‘खबर लहरिया’ नाम का यह अखबार यूपी के साथ-साथ बीहार में भी प्रसारित किया जाता है. अवधि, बुंदेली, भोजपुरी, हिंदुस्तानी, आदि भाषाओं में इसे छापा जाता है जिसे यूपी के सैकड़ों लोग पढ़ते हैं. इसके अलावा यह अखबार वज्जिका भाषा में भी छपता है जिसे यह महिलाएं बिहार तक पहुंचाती हैं.


हर हफ्ते यह महिलाएं अपनी अखबार की 6,500 कॉपियां छपवाती हैं जिसे चित्रकूट, बांडा, बनारस, माहोबा, लखनउ व फैजाबाद में भेजा जाता है. इस अखबार को कम से कम 80,000 पाठकों का दर्जा हासिल है.


कैसे शुरु किया यह अभ्यास


इस अखबार की संपादक मीरा ने असल में एक रिपोर्टर के तौर पर यहां काम करना शुरु किया था. बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से राजनीति में मास्टर डिग्री हासिल करने वाली मीरा ने वर्ष 2002 में यहां काम शुरु किया व वर्ष 2005 में वो इस अखबार की संपादक बनीं. इसके अलावा मीरा ‘महिला सामाख्या’ की पर्यवेक्षक भी रह चुकी हैं.


khabar lahariya


कुछ कर दिखाने का जज्बा मीरा में तब पैदा हुआ जब वे केवल 24 वर्ष की थीं और उनके पति कोई काम धंधा नहीं करते थे. पैसे की कमी को पूरा करने के लिए मीरा ने घर की रोटी-रोजी का जिम्मा अपने सिर उठाया जिसमें उनके पति ने भी उन्हें सहायता दी. मीरा का कहना है कि उनकी सास ने उन्हें ऐसा करने से कई दफा रोका लेकिन पति से मिलने वाली हिम्मत से मीरा का जज्बा नहीं टूटा और वो आगे बढ़ती गई.


Read More: आज भी कायम है ‘फीमेल स्लेव’ की अवधारणा, पढ़िए इंसानियत को शर्मसार करती एक घिनौनी हकीकत


मन के जज्बे ने की मदद


मीरा केवल 10 वर्ष की थी जब उन्होंने महिला सामाख्या संस्था में कदम रखा था. वहां महिलाओं को पढ़ाया लिखाया जाता था लेकिन जैसे ही कुछ महीनों की पढ़ाई समाप्त हुई तो महिलाओं के पास आगे पढ़ने के लिए कुछ भी नहीं बचा था. इसी के फलस्वरूप संस्था की महिलाओं द्वारा ‘महिला डाकिया’ नाम का एक अखबार शुरु किया गया.


khabar lahariya reader


केवल बुंदेली में बिकने वाले इस अखबार के चार पन्ने थे जिन पर मीरा खुद खबर लिखती थीं. यह एक तरह का मासिक अखबार था जिसकी फोटोकॉपी करवा कर घर-घर पहुंचाया जाता था. मीरा बताती हैं कि यह अखबार पैसों की कमी के कारण 1999 में बंद कर दिया गया था और कुछ समय बाद वे खुद भी इस संस्था को छोड़ गई थी.


Read More: जन्म के साथ ही यह मासूम एक ऐसा खौफ अपने साथ लेकर आते हैं जिसे देख आप सहम जाएंगे….जानना चाहते हैं क्या है ये..


फिर जगी उम्मीद की एक किरण


महिला डाकिया के बाद उस क्षेत्र में मानो जानकारी का कोई भी स्रोत नहीं बचा था. कुछ समय बाद दिल्ली की एक संस्था ‘निरंतर’ की मदद से ‘खबर लहरिया’ ने जन्म लिया. मीरा के अनुसार यह सिलसिला केवल 7 रिपोर्टरों व 1,000 कॉपियों द्वारा शुरु किया गया था जिसे चलाने के लिए कुछ संस्थाओं द्वारा योगदान दिया जाता था.


khabar lahariya team


मीरा के अनुसार यह काम जितना आसान दिखता है उतना था नहीं. अखबार को चलाने के लिए महिलाओं को एकत्रित करना ही सबसे बड़ी चुनौती थी क्योंकि हमारे भारत देश में ऐसे क्षेत्रों में एक महिला का बाहर निकलकर काम करना अपने आप में चुनौती है.


Read More: विधवाओं पर समाज द्वारा लगाई जाने वाली पाबंदी का वैज्ञानिक पहलू भी है..जानिए क्यों विज्ञान भी उनके बेरंग रहने की पैरवी करता है


मेहनत से हासिल किये पुरस्कार


इस अखबार के लिए काम करने वाली सभी महिलाएं ऐसे समाज से तालुकात रखती हैं जहां एक महिला की आजादी न्यूनतम दर्जे पर रखा जाता है. मीरा ने बताया कि शुरुआत में इन सभी महिलाओं को न तो कम्प्यूटर का ज्ञान था और न उनमें पत्रकारिता की समझ थी. लेकिन बाद में उन्हें वह सब चीज सिखाया गया जिसकी आवश्यकता पत्रकारिता में होती है.


khabar lahariya reading


अब यह सभी महिलाएं मिल कर 8 पन्नों का अखबार चलाती हैं जिसमें हर तरह के मुद्दे पर लेख लिखे जाते हैं और खासतौर पर एक पन्ना महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए रखा गया है. इनके परिश्रम ने इस अखबार को वर्ष 2004 में न केवल ‘चमेली देवी जैन पुरुस्कार’ दिलवाया है बल्कि यूनेस्को की ओर से इसे वर्ष 2009 में ‘किंग सेजॉग लिटरेसी प्राइज’ भी हासिल कराया है.


फिलहाल यह अखबार पहले की तरह ही प्रकाशित किया जा रहा है लेकिन पूंजी की कमी के कारण जल्द ही इसके बंद हो जाने की भी आशंका है. यदि कुछ समय में संस्था को कोई नया निवेशक नहीं मिला तो शायद इस अखबार व इससे जुड़ी महिलाओं के सपनों के दरवाजे बंद हो सकते हैं.


Read More:

प्रेमी के साथ मिलकर खुद के ही बच्चे को बनाया अपनी हवस का शिकार, क्या ऐसी होती है मां? पढ़िए इंसानियत को शर्मसार करती एक घटना


पहले शराब पिलाते हैं फिर इलाज करते हैं, क्या यहां मरीजों की मौत की तैयारी पहले ही कर ली जाती है?


मानव मष्तिक को कई वर्षों तक झकझोरती रही यह तस्वीरें



Tags:                                       

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

1 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

suman lata के द्वारा
September 30, 2014

i like your strong power , i like you & all women, Mahila sakti zindabad.


topic of the week



अन्य ब्लॉग

latest from jagran