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क्यों रहती है वो अकेली, शक की नजर से ताड़ती हैं भेदिया निगाहें?

Posted On: 31 Mar, 2014 social issues में

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आप किसी भी समाज से नाता रखते हों, अगर जीना है तो सहारे की जरूरत पड़ेगी. इस सहारे का किसी की आर्थिक स्थिति से कोई वास्ता नहीं, अगर वास्ता है तो आपके जीवन में भावनात्मक जरूरतों से. यह नियम हालांकि महिला-पुरुष दोनों पर ही समान रूप से लागू होता है लेकिन सामाजिक ताना-बाना कुछ ऐसा बुना गया है कि पुरुषों को इससे पूरी तरह आजाद और महिलाओं को यहां भी नियम से बांध दिया गया है.


importance of marriage for a woman


शादी! शायद आपने कभी गौर नहीं किया लेकिन पहले भी और आज के समाज में भी जन्म लेने-मरने के बाद अगर कोई सबसे बड़ी सच्चाई मानी जाती है तो वह है शादी. खासकर हमारा भारतीय समाज इस शादी के लिए हमेशा प्रतिबद्ध दिखता है. शादी की वचनबद्धता जितना इसके 7 वचनों में नहीं होंगी हमारा यह भारतीय समाज उससे कहीं ज्यादा इन शादियों के लिए वचनबद्ध दिखता है. गौर करने वाली बात यह है कि किसी औरत और मर्द को एक पूरा जीवन साथ बिताने के लिए जोड़ने वाला यह रिवाज पुरुषों को किसी खास मकसद से नहीं रोकता लेकिन महिलाओं को हमेशा रोकता है. समाज में शादी करने के लिए नियम हैं लेकिन अगर कोई न करना चाहे तो जरूरी नहीं कि वह शादी करे ही. हर पुरुष इसके लिए अपने फैसले लेने को आजाद है लेकिन कोई भी महिला इस फैसले के लिए आजाद नहीं है.


एक ‘हां’ शादी करने की, एक ‘ना’ शादी न करने की, मतलब उम्रभर कुंआरा रहने की. एक आदमी के लिए ‘हां’ और ‘ना’ दोनों आसान हैं पर बात जब एक औरत की आती है जिसकी शादी नहीं हुई उसके लिए ‘ताउम्र शादी न करने का फैसला खुद के लिए कितनी भी मुश्किल हो लेकिन उससे कहीं ज्यादा मुश्किल अपने परिवार, नजदीकी यहां तक कि दूर के रिश्तेदार, आसपास रहने वाले लोगों को इसके लिए मनाने में होती है. लड़के अगर शादी के लिए मना करें, आवाज इस पर भी उठती है लेकिन उस स्थिति में उसके साथ कोई तोहमत (बुरी स्थिति) नहीं जुड़ती जबकि लड़की का कुंआरा रहना अक्सर लोगों की नजर में उसका चरित्र संदेहास्पद बनाता है.

स्त्री का दर्द क्या होता है यह कोई इनसे पूछे !!


लड़की का शादी न करने का फैसला करने का अर्थ है उसे तमाम उलाहनों और शक की नजर से ताड़ने वाली भेदिया निगाहों से सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहना पड़ता है. एक उम्र के बाद शादी न करने वाली लड़कियों के लिए हमारे समाज का सहयोगी रवैया बिल्कुल नहीं होता. लड़की के शादी न करने के पीछे कई तरह की अटकलें लगाई जाती हैं जिनमें अमूमन लड़की का कैरेक्टर खराब होना, कई लड़कों से संबंध होना सबसे आम है. इतने पर भी ये अटकलें रुकती नहीं. खुद को आजाद कहने वाली कुंआरी लड़की कभी भी आजाद नहीं होती. मां-बाप से ज्यादा पड़ोसियों की उन पर नजरें होती हैं जैसे कहां जाती है, किससे मिलती है, कहां काम करती है, क्या काम करती है, और तो और ऑफिस कब जाती है और ऑफिस से वापस कब आती है.


women in india


आज शादी से भागने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ रही है. मेट्रो शहरों से लेकर छोटे शहरों तक भी ऐसी लड़कियां अब अजूबा नहीं रह गई हैं लेकिन इनके प्रति समाज का रवैया हमेशा आज तक अजूबा ही है. कॅरियर को प्राथमिकता देने वाली अधिकांश लड़कियों के लिए शादी न करने के पीछे किसी बंधन से परे एक आजाद जिंदगी जीना होता है, इसके अलावे भी हर किसी के अलग-अलग कारण हो सकते हैं. किसी एक्स्ट्रा जिम्मेदारी से मुक्त रहते अपनी जिंदगी जीना लगभग हर किसी की प्राथमिकता होती है लेकिन यह सामाजिक ढांचा उनकी इस जिंदगी को भी एक चुनौती बना देता है.

मैं नीर भरी दु:ख की बदली…

अल्लाह मेरे, दुआ मेरी कुछ काम न आई..

इस नई चुनौती का सामना समाज को एक साथ करना होगा

Web Title : Society towards Unmarried Women in india



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rahul के द्वारा
April 4, 2014

लड़के अगर शादी के लिए मना करें, आवाज इस पर भी उठती है लेकिन उस स्थिति में उसके साथ कोई तोहमत (बुरी स्थिति) नहीं जुड़ती जबकि लड़की का कुंआरा रहना अक्सर लोगों की नजर में उसका चरित्र संदेहास्पद बनाता है.

rahul के द्वारा
April 4, 2014

कॅरियर को प्राथमिकता देने वाली अधिकांश लड़कियों के लिए शादी न करने के पीछे किसी बंधन से परे एक आजाद जिंदगी जीना होता है, इसके अलावे भी हर किसी के अलग-अलग कारण हो सकते हैं. किसी एक्स्ट्रा जिम्मेदारी से मुक्त रहते अपनी जिंदगी जीना लगभग हर किसी की प्राथमिकता होती है लेकिन यह सामाजिक ढांचा उनकी इस जिंदगी को भी एक चुनौती बना देता है.

ashokkumardubey के द्वारा
April 1, 2014

आधुनिक समाज में अब पहले जैसी बात नहीं रही है आज हर कोई आज़ाद है अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने के लिए और आजकल अविवाहित रहने का चलन बढ़ा है और इस नए दौर में महिलायें और पुरुष दोनों ही आजाद रहने को प्राथमिकता देते हैं आज का नवजवान झंझटों में नहीं पड़ना चाहता हाँ महिलाओं को जरूर सामाजिक तानों से दो- चार होना पड़ता है पर जब किसी ने निश्चय कर ही लिया कि हमको अकेले रहना है फिर तानों का क्या !उन तानों से बेपरवाह रहना भी आना चाहिए वैसे भी रीती रिवाज और समाज इन सबको मानता कौन है ? समाज लोगों कि मदद के लिए बना था ना की लोगों की आजादी छीनने के लिए


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