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एक औरत का खून बचाएगा एड्स रोगियों की जान

Posted On: 5 Mar, 2014 social issues में

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एचआईवी/एड्स के लिए आज भी कोई वैक्सीन नहीं है. एक बार इसके संक्रमण के बाद थोड़े दिनों के लिए जिंदगी बढ़ाई जा सकती है लेकिन दुनिया का कोई डॉक्टरी इलाज एचआईवी संक्रमण से छुटकारा नहीं दिला सकता. हालांकि अब एक अफ्रीकन महिला दुनिया भर के एचआईवी पीड़ितों के लिए अपने खून से वैक्सीन बनाने की पहल कर रही है.


साउथ अफ्रीका में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ कम्यूनिकेबल डिजीजेज के साइंटिस्ट ने एक एचआईवी संक्रमित महिला के खून में एचआईवी/एड्स को ठीक कर सकने वाले एंडीबॉडीज का पता लगाया है. वैज्ञानिक हैरान हैं कि इस एचआईवी पॉजिटिव महिला के खून में एचआईवी वायरस को खत्म करनेवाला ‘ब्रोडली न्यूट्रिलाइज्ड एंटिबॉडीज’ है जिसे कैप्रिसा 256 नाम दिया गया है. डॉक्टरों के अनुसार सभी एचआईवी संक्रमित रोगियों के खून में एंटीबॉडीज डेवलप होते हैं लेकिन सभी एंटीबॉडीज इस संक्रमण को रोकने में काम नहीं करते.

HIV killing Antibodies




एचआईवी वायरस पर एंटीबॉडीज काम क्यों नहीं करता

दरअसल एचआईवी वाइरस के चारों ओर शुगर की एक लेयर होती है जो किसी भी एंटीबॉडीज को वाइरस तक पहुंच सकने में रोकती है और इस तरह एचआईवी वाइरस को खत्म करना नामुमकिन हो जाता है.


यह अफ्रीकन संक्रमित महिला किस तरह खास है

रिसर्च के दौरान नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ कम्यूनिकेबल डिजीजेज के वैज्ञानिकों ने इस महिला के खून में संक्रमण होने के बाद 6 से 225 सप्ताह में पनपे एंडीबॉडीज को एचआईवी वाइरस को खत्म करने में सक्षम पाया. हालांकि सभी एचआईवी संक्रमित रोगियों के शरीर में उनका इम्यून सिस्टम एचआईवी वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज बनाता है लेकिन वे सभी एंटीबॉडीज इन वायरस को खत्म करने में सक्षम नहीं होते. 5 एचआईवी संक्रमित रोगियों में केवल 1 के शरीर में ही ऐसे एंडीबॉडीज बनते हैं जो इस वायरस को मारने में सक्षम होते हैं. इन्हें ही डॉक्टरी भाषा में ‘ब्रॉडली न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज’ कहते हैं.


इस अफ्रीकी महिला के शरीर में बनने वाले एंटीबॉडीज इस एक में भी अलग इस तरह है क्योंकि यह अलग-अलग प्रकार के एचआईवी वायरस को भी मार सकने में सक्षम है. इस एंटीबॉडीज में कुछ ऐसी शाखाएं हैं जो एचआईवी वायरस के शुगर कोट के अंदर जाने में सक्षम हैं और इस तरह वायरस को खत्म करना संभव हो जाता है.

एक कहानी ऐसी भी


दुख की बात

एचआईवी के संक्रमण को खत्म करने के लिए अब तक केवल एक बार थाइलैंड में सक्सेसफुल क्लिनिकल वैक्सीन ट्रायल 2009 में किया जा सका है जो मात्र 30 प्रतिशत मामलों में एचआईवी के संक्रमण से सुरक्षित रख सकने में सक्षम साबित हुआ था. हालांकि इस अफ्रीकी महिला के एंटीबॉडीज से एड्स से बचने का वैक्सीन बन सकता है पर वैज्ञानिकों के अनुसार पहले इसका प्रयोग बंदरों पर किया जाएगा और सफल होने के बाद ही इंसानों पर आजमाया जाएगा.


इन सबमें दुख की कोई बात नहीं लेकिन दुख की बात इस महिला के लिए है। इस महिला का खून एक्सपेरिमेंट के लिए सैंपल के रूप में रख लिया गया है और वह जरूरत पड़ने पर और भी खून देने को तैयार है. लेकिन अगर यह एक्सपेरिमेंट सफल भी रहता है तो भी इस महिला के लिए वह वैक्सीन काम नहीं करेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि शरीर में एंडीबॉडीज बनने में काफी समय लगता है जबकि एचआईवी वायरस अपनी गति से बढ़ते रहते हैं. ऐसे में जब तक एंडीबॉडीज बनते हैं वह पुराने वायरस को काबू करने के लिए होते हैं जबकि यह नया वायरस उससे ज्यादा ताकतवर होता है. इसलिए इस महिला के लिए दुख की बात है कि इसके एंडीबॉडीज दूसरों के लिए वैक्सीन बना सकते हैं लेकिन इसके अपने एचआईवी संक्रमण के लिए इसका कोई फायदा नहीं.


खैर जो भी हो, अफ्रीका, जहां कुल आबादी का 10 प्रतिशत हिस्सा (10 मिलियन लोग) एचआईवी/एड्स से संक्रमित हैं, इस नई खोज से उनके लिए आशा की नई किरण जागी है. साथ ही अगर यह वैक्सीन बन गया तो पूरी दुनिया के लोगों के लिए एक वरदान होगा और मेडिकल साइंस की दुनिया में अफ्रीका इस खोज के लिए हमेशा याद किया जाएगा. उससे भी पहले यह महिला अपना खून देकर दुनिया को एड्स से बचाने के लिए याद की जाएगी.

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Web Title : antibody that kills different strains of the HIV virus



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