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एक कहानी ऐसी भी

Posted On: 18 Jan, 2014 social issues में

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सामाजिक परिवर्तनों के इस दौर में भी भावनात्क स्तर पर महिलाएं उस ऊंचाई को नहीं छू नहीं सकी हैं जो महिलाओं की सशक्त और गंभीर भूमिका को सुनिश्चित करती है. महिला और पुरुष समाज के दो मानक हैं. एक की भी कमजोरी समाज की कमजोरियों का कारण बन सकती है. अक्सर इसे पुरुष प्रधान समाज की खामियों से जोड़ दिया जाता है लेकिन वास्तविकता में यह महिलाओं की कमजोर भावुक मन:स्थिति होती है जो ‘पुरुष प्रधान समाज’ के अस्तित्व और इसकी खामियों को शह देने के साथ ही खुद अपनी ही कमजोरी भी बन जाती हैं.


2010 की सनसनी रही शशि थरूर-सुनंदा पुष्कर प्रेम कहानी का दुखद अंत सुनंदा पुष्कर की मौत के साथ हो गया. कथित तौर पर अपने पति और केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के साथ अफेयर की चर्चा से क्षुब्ध और दुखी सुनंदा ने आत्महत्या कर ली. पर्दे के पीछे की कहानी क्या है यह तो सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर ही बता सकते हैं लेकिन दीवानगी के आलम के साथ शुरू हुई प्रेम कहानी में सुनंदा की रहस्यमयी मौत ने एक बार फिर आधुनिक समाज में सशक्त महिला के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर दिया है.


विश्व के लगभग हर कोने में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की स्थिति समाज में कमजोर ही है. भारतीय समाज इससे बहुत अलग नहीं है लेकिन संस्कृति की साड़ी में लिपटी महिलाएं यहां कुछ ज्यादा कमजोर नजर आती हैं. हालांकि भारतीय इतिहास में कई सशक्त महिलाएं रही हैं. धार्मिक ग्रंथों में देवी दुर्गा से लेकर मुगलकालीन रजिया सुल्तान और आधुनिक भारत की शुरुआत की लक्ष्मीबाई, सरोजनी नायडू आदि कई महिलाएं सशक्त भारतीय महिलाओं का प्रतीक रूप बनकर उभरीं लेकिन जब असलियत की जमीन की कलई खुलती है तो यह सब सिर्फ प्रतीकात्मक नजर आता है.


women empowermentकभी चारदीवारी के अंदर दबी-छुपी, पर्दे के पीछे शोषित, सती प्रथा, बाल विवाह जैसी सामाजिक शोषण का शिकार महिलाएं आधुनिकता की स्वीकार्यता बढ़ने के साथ सशक्त होती मालूम पड़ने लगीं. चारदीवारी की ओट से सहमी सी औरत ने हौले-हौले घर से बाहर कदम बढ़ाया था. धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए अपनी दक्षता वाले क्षेत्रों में प्राधान्यता हासिल करने के साथ शिक्षा से लेकर विज्ञान, तकनीक, व्यापार और पुरुष प्रधान माने जाने वाले लगभग हर क्षेत्र पर अपनी श्रेष्ठता साबित करती हुई चलने लगी. इसमें परंपरागत चीजों से अलग और भी बहुत कुछ था. अभी सोशल साइट फेसबुक की भारतीय अधिकार क्षेत्र की देखभाल एक भारतीय महिला के हाथ है. अभी कुछ दिनों पहले किसी लड़की द्वारा अनिल अंबानी, शाहरुख खान जैसे कुछ जाने-पहचाने बड़े चेहरों का बैंक अकाउंट हैक करने की खबर न्यूज में छाई रही. ये ऐसे वाकए हैं जो ऊपरी तौर पर दिखाते हैं कि शारीरिक काम से लेकर दिमागी कसरत तक हर जगह महिलाएं सिद्धहस्त होने लगी हैं. आधुनिक समाज में महिलाओं की बदलती यही छवि अब नारी को बेचारी से बहुत आगे ले जाती दिखाती है. इसमें बेचारी को कहीं बहुत पीछे छोड़कर सशक्तिकरण की पुजारी बन चुकी यह नारी अपनी सशक्त पहचान के लिए अब कभी पीछे मुड़कर नहीं देखेगी ऐसा लगता है.

बेवफाई का दर्द सहन नहीं कर पाईं सुनंदा पुष्कर


पर लगता है कि भावनाओं के समंदर में आज भी पहले की तरह गोते लगाती इन महिलाओं के लिए तस्वीर आज भी पहले के ही समान है.


भावनात्मक तौर पर कमजोर मानी जाने वाली महिलाएं वास्तव में आज भी बेहद कमजोर हैं. महिलाओं को अक्सर शिकायत होती है कि पुरुष भावनाओं को ज्यादा तरजीह नहीं देते किंतु वास्तविकता यही है कि पुरुष सशक्त भी इसी कारण हैं. भावनाओं को तरजीह देने वाले पुरुष भी कमजोर की श्रेणी में रख दिए जाते हैं. हकीकत में देखें तो भावनाएं कमजोरी का कारण बनती भी हैं. कार्यक्षेत्र में अपनी पहचान रही महिलाएं व्यक्तिगत मामलों में हमेशा भावना प्रधान होती हैं. लिव इन रिलेशन में प्रेमी से धोखा, शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाने और बाद में शादी से मुकर जाने, पहले से शादीशुदा से संबंध बनाने आदि जैसे कई वाकए आज भी महिलाओं की इस भावनात्मक कमजोरी को दर्शाते रहे हैं. खासकर प्रेम संबंधों में असफल महिलाओं द्वारा आत्महत्या आदि के मामले आज इस कमजोरी को और बढ़े होने को जाहिर कर रहे हैं. अभी हाल ही में अभिनेत्री जिया खान की कथित् अत्महत्या की खबरें भी न्यूज में छाई रहीं. फैशन, हीरोइन फिल्मों में भी महिलाओं की इस स्थिति को दिखाया गया था जो वास्तव में कहीं न कहीं आज का एक बड़ा सच है.


कार्यक्षेत्र में बड़ा से बड़ा मुकाम हासिल करने वाली महिलाएं भी व्यक्तिगत जीवन में भावनात्मक कमजोरी का शिकार होकर न सिर्फ शोषित होती हैं बल्कि वह इससे जुड़ी महिलाओं को भी शोषित करती हैं. शादीशुदा पुरुषों के प्रेम में पड़कर किसी महिला की शादीशुदा जिंदगी को अपनी व्यक्तिगत भावनात्मक कमजोरी के लिए कुर्बान करते हुए वे शायद नहीं सोचतीं या सोचती भी हैं तो अपनी भावनाओं के प्रवाह में ऐसा होने देने के लिए मजबूर होती हैं.


शायद सुनंदा पुष्कर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. शादीशुदा शशि थरूर के प्रेम में दीवानी सुनंदा पुष्कर से शादी करने के लिए जुड़वा बच्चों के पिता शशि थरूर ने अपनी दूसरी पत्नी को तलाक दे दिया था. अब पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार से थरूर के अफेयर के चर्चों से परेशान सुनंदा की रहस्यमयी मौत कई सवाल खड़े करती है. इससे पहले 2009 में चांद और फिजा प्रकरण (चंद्रमोहन और अनुराधा बाली) में भी कुछ ऐसी ही कहानी सामने आई थी. अपनी भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाती ये महिलाएं स्वयं ही स्वयं के लिए शोषक और शोषित दोनों बन जाती हैं. इसके लिए पुरुष प्रधान समाज को दोष देने का कोई अर्थ नहीं बनता. ऐसी स्थितियों से बचने के लिए महिलाओं को खुद ही सोचना होगा. सिर्फ पुरुष प्रधान समाज पर दोष मढ़कर इसका कोई हल निकाल पाना संभव नहीं होगा. आधुनिक समाज में महिला सशक्तिकरण की आड़ में भावनात्मक कमजोरियों को छुपाया जा सकता है लेकिन इससे एक सशक्त समाज जिसके विकास में सशक्त महिलाओं की सशक्त भूमिका हो ऐसा संभव नहीं है. जब तक महिलाएं अपनी भावनात्मक कमजोरियों पर नियंत्रण नहीं पातीं महिला सशक्तिकरण के दावे खोखले साबित होते रहेंगे और ऐसे वाकए भी सामने आते रहेंगे.

मैं नीर भरी दु:ख की बदली…

आखिरकार क्या हुआ था 16 दिसंबर की रात ?

क्यों बढ़ने लगी है नारी निकेतन जैसे संस्थाओं की जरूरत


Web Title : status of empowered women in india



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