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नहीं कर सकता है पति अब प्रताड़ित

Posted On: 12 Jun, 2013 Others में

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आजादी के समय से ही भारत में महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए सरकारी प्रयास शुरू हो गए थे. पर्दा प्रथा, समाज में पुरुषों के बराबर महिलाओं को हिस्सेदारी दिलाने से लेकर महिलाओं को घर से बाहर निकलकर पुरुषों के बराबर नौकरियां करने जैसे कई सुधार कानून लाए गए. महिला सशक्तिकरण की दिशा में ये कानून बहुत हद तक कारगर सिद्ध हुए. आज भी महिला सशक्तिकरण की दिशा में जरूरत के अनुसार पहले से बने कानूनों में फेरबदल या नए कानून बनाने की प्रक्रिया जारी है. हालांकि काल और समय अनुसार यह प्रक्रिया अनवरत चलने वाली होती है पर कोई भी नियम-कानून तभी प्रभावी और लाभकारी हो सकता है जब उसे सही जगह उपयोग किया जाए. महिला कानूनों के लिए भी यह सिद्धांत लागू होता है. इसमें कोई शक नहीं कि आज के दौर की भारतीय महिला अपने अधिकारों और हितों के लिए जागरुक है. पर आज भी कई महिलाएं हैं जो महिला सशक्तिकरण के लिए सरकारी नियमों से वाकिफ नहीं हैं और जरूरत पड़ने पर इसका लाभ पाने में अक्षम हैं.

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women empowermentहमारे संविधान (Constitution of India ) का आर्टिकल 14 (Article 14) भारत में महिला को समानता का अधिकार देती है. आर्टिकल 15(1) State (Article 15(1)) राज्य को महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव से प्रतिबंधित करता है. आर्टिकल 16 (Article 16) में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में बराबर सुविधाएं देने का प्रावधान है. पहले अकसर महिलाओं को एक ही काम के लिए पुरुषों से कम वेतन दिया जाता था. इसे दूर करने के लिए आर्टिकल 39(द) (Article 39(d)) में महिलाओं को समान कार्यों के लिए पुरुषों के समान वेतन दिए जाने का प्रावधान है. आर्टिकल 15(3) (Article 15(3)) राज्यों को महिलाओं और बच्चों के हित में विशेष कानून बनाने का अधिकार देती है. आर्टिकल 51(अ) (ए) (Article 51(A) (e)) महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध किसी कार्य को अंजाम देने से रक्षा करता है. आर्टिकल 42 (Article 42) राज्यों को मानवता और मातृत्व के आधार पर महिलाओं को कार्यक्षेत्र में सुरक्षा प्रदान करने के लिए कानून बनाने का हक देता है.

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ये कुछ संवैधानिक प्रावधान हैं जो एक लोकतांत्रिक समाज में महिलाओं को समान अधिकार देते हैं. इसके अलावे भी समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए दहेज उन्मूलन कानून, विवाह कानून आदि बनाए गए हैं. हाल के वर्षों में महिलाओं की असुरक्षा की स्थिति को देखते हुए महिलाओं को रात्रि की पाली में काम करवाना गैरकानूनी करार दिया गया. 1990 में महिलाओं की सुरक्षा के लिए महिला आधारित एनजीओ बनाने की सरकारी मंजूरी मिलने के बाद सेवा (Self Employed Women’s Association) जैसी महिला संस्थाओं ने महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किए. इसके अलावे महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए कानूनन अब पिता की संपत्ति में बेटी को भी अधिकार प्रदान किया गया है. महिलाओं के विरुद्ध हिंसक प्रवृत्तियों को रोकने तथा महिलाओं की सुरक्षा हेतु घरेलू हिंसा कानून एक उल्लेखनीय कानून है. यह घर के अंदर पति या परिवार द्वारा मानसिक या शारीरिक किसी भी रूप में महिलाओं को प्रताड़ित करने की स्थिति में दंड का प्रावधान करता है. इसके अलावे महिला भ्रूण हत्या, बलात्कार, छेड़छाड़ भी अब कानूनन दंड का अधिकारी है.


महिलाओं को अकसर यही नहीं पता होता है कि जो उनके साथ हो रहा है वह कानूनन अपराध की दृष्टि में आता भी है या नहीं. अकसर महिलाएं यह सोचकर चुप रह जाती हैं कि छेड़छाड़, गालियां देना, धमकाना, पति द्वारा आर्थिक यातना आदि उनकी निजी समस्याएं हैं जिनका राज्य और कानून से कोई वास्ता नहीं है, जबकि कानून साफ-साफ इन्हें दंडात्मक श्रेणी में लाता है. हालांकि शहरी और शिक्षित महिलाएं बहुत हद तक जागरुक हैं. फिर भी पूर्णरूपेण महिला सशक्तिकरण के लिए इनका हर महिला द्वारा जाना जाना और जागरुक होना आवश्यक है.

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1 प्रतिक्रिया

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shama के द्वारा
June 14, 2013

हां, महिलाएं जागरुक होंगी, तभी कुछ हो सकता है.


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