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खुदी को कर बुलंद इतना....

Posted On: 22 May, 2013 में

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नर हो, न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो, जग में रहकर कुछ नाम करो.

कवि की ये पंक्तियां आज नर और नारी दोनों के लिए समान रूप से प्रभावकारी कही जा सकती हैं. भले ही महिलाएं हमेशा से ही पुरुषों की तुलना में शारीरिक दृष्टि से कमजोर समझी जाती रही हैं लेकिन फिर भी आधुनिक महिलाओं ने हर क्षेत्र में सफलता हासिल की है. आज से एक दशक पहले के ही वक्त पर नजर डालें तो महिलाओं के लिए कुछ सीमित कार्यक्षेत्र थे जिनसे बाहर काम करने के लिए उन्हें उपयुक्त नहीं समझा जाता था.  कुछ ही महिलाएं होती थीं जो इन दायरों से निकलकर कुछ अलग कर पाती थीं, लेकिन उनसे प्रेरणा लेने के बजाय उन्हें भाग्यशाली करार दे दिया जाता था. समाज में महिलाओं और पुरुषों के बीच कार्यक्षेत्र का यूं बंटा होना महिलाओं के विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा थी। क्योंकि यह समाज में महिलाओं को एक कमजोर पर जरूरी घटक के रूप में स्थापित करता था, जिसे सुरक्षित रखने के लिए बहुत ज्यादा कोशिशें करने की जरूरत पड़ती थी और पुरुष वर्ग की समझ से महिलाओं की सुरक्षा के लिए उन्हें ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी. महिलाओं के प्रति यह सोच पुरुषों और महिलाओं के बीच एक लंबी दूरी खींच जाती थी. वस्तुत: समाज में बेटियों को बोझ समझे जाने के पीछे भी यह एक महत्वपूर्ण कारक रहा है.

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लेकिन अब समाज बदल रहा है. आज पुरुषों और महिलाओं के बीच कार्यक्षमता को लेकर भी जितने दायरे थे वे टूट रहे हैं. महिलाएं हर वो काम कर रही हैं जो पहले जिसे सिर्फ पुरुषों के लिए ही उपयुक्त माना जाता था. शिक्षा से लेकर खेलकूद और घरेलू स्तर पर भी महिलाएं सफलापूर्वक काम कर रही हैं. इतना ही नहीं ये समाज के लिए एक प्रेरणा भी साबित हो रही हैं.

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ऐसी ही एक प्रेरणा हैं भारत की अरुणिमा. अरुणिमा कोई आम महिला नहीं है, वह एक वॉलीबाल खिलाड़ी थीं. एक हादसे में वे अपना पैर भी गवां चुकी हैं, फिर भी अपने कृत्रिम पैरों के सहारे एवरेस्ट की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचकर इन्होंने नया कीर्तिमान स्थापित किया है.

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करीब दो साल पहले कुछ बदमाशों ने चलती ट्रेन से उन्हें बाहर फेंक दिया था जिसमें वह बुरी तरह घायल हो गई थी और उसकी जान बचाने के लिए डॉक्टरों को उसका बायां पैर काटना पड़ा. इस हादसे के बाद और कोई होता तो हौसला हार चुका होता पर अरुणिमा ने हिम्मत नहीं हारी और भारत की पहली महिला पर्वतारोही बछेंद्री पाल के दिशानिर्देश में पर्वतारोहण की ट्रेनिंग लेते हुए दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर पांव जमाने में सफल रही. माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली अरुणिमा भारत की पहली महिला विकलांग हैं. इससे पहले भी अरुणिमा लद्दाख में 21000 फ़ीट की ऊंचाई तय कर चुकी है.

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अरुणिमा की जीत केवल भारत में बदलती महिलाओं की स्थिति की तस्वीर ही नहीं है बल्कि उसका यह साहसी कदम उन महिला-पुरुष विकलांगों के लिए प्रेरणास्रोत है जो अपनी विकलांगता को अभिशाप समझते है. अरुणिमा ने यह साबित कर दिया जीवन में कई हादसे ऐसे भी होते हैं जो आपके जीवन की दिशा ही बदल देते हैं. भले ही वे हादसे एक वक्त के लिए आपको सब कुछ गंवा देने का एहसास कराएं पर अगर हौसला हो तो उससे उबरना और कुछ बड़ा करने में फिर भी आप सक्षम होते हैं. अरुणिमा ने साबित कर दिया कि जिंदगी की परेशानियों से आपका हौसला ज्यादा मजबूत है. अगर हौसला हो तो आप हर परेशानी को पीछे छोड़ते हुए अपनी मंजिल पा सकते हैं. अरुणिमा के इस साहस को सलाम!


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ऋषभ शुक्ला के द्वारा
May 22, 2013

आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया


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