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हद पार हुई तब मौत की गुहार लगाई

Posted On: 23 Nov, 2012 में

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women lifeमौत की गुहार तब लगाई जाती है जब सारी हद पार हो जाती है. “रात को ढाई बजे का समय था. वही लड़के जो मुझे छेड़ा करते थे, वो बदला लेने के इरादे से आए और फिर मेरे साथ कुछ ऐसा किया जिसकी कभी भी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. मेरे चेहरे पर तेज़ाब फेंक दिया. मेरा चेहरा बुरी तरह जल गया और तेज़ाब आंखों में चला गया. ऐसा लग रहा था कि किसी ने मुझे आग की भट्ठी में डाल दिया हो, इतनी जलन हो रही थी. आंखों के सामने अंधेरा हो गया था, मैं रो रही थी और रोते रोते बेहोश हो गई.” यह कहानी है कल्पना की( बदला हुआ नाम) जो अपनी मौत की गुहार लगा रही है.


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दर्द भरी कहानी

women life and societyकल्पना की उम्र 27 साल है पर जब कल्पना के साथ यह हादसा हुआ वो दिन 22 अप्रैल 2003 की रात थी पर आज तक उसके चेहरे पर लगे घाव भर नहीं पा रहे हैं….भरे भी कैसे भला 9 साल पुराने घाव हैं वो भी ऐसे जिन पर आज तक मरहम नहीं लगाया गया है. पिछले दस सालों में जिन शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक तकलीफों से कल्पना होकर गुज़री हैं उसके बारे में सोचकर ही घबराहट सी होती है. कल्पना ने अपने बारे में बताया कि “ज़िंदगी बहुत अच्छी नहीं थी तो बहुत बुरी भी नहीं थी. पढ़ाई के साथ-साथ मैं एक निजी कंपनी में काम भी करती थी. मन में बहुत सारे सपने थे और उमंगें थीं. इस बीच कुछ लड़के मुझे आते-जाते परेशान करने लगे जैसा कि समाज में अकसर होता है. काफी दिनों तक मैं इन लड़कों को नज़रअंदाज़ करती रही पर एक दिन मैंने हिम्मत दिखाई और उन्हें आगाह किया पर मुझे नहीं पता था कि उन लड़कों को आगाह करने का खामियाजा मुझे अपने चेहरे को खोकर चुकाना होगा.


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कल्पना की दर्द भरी कहानी यहीं समाप्त नहीं होती है. कल्पना ने अपने चेहरे को तो खोया ही और साथ ही अपने परिवार का सुख भी खो दिया. ऐसा नहीं था कि कल्पना के परिवार ने उसकी मदद करने की कोशिश नहीं की पर कल्पना के इलाज का जो खर्चा था उसके लिए उसके परिवार ने अपने गहने, जमीन सब बेच दिया. कल्पना के परिवार की हालत ऐसी हो चुकी थी कि खाने तक के लाले पड़ गए थे. ऐसे हालत के बावजूद कल्पना पर तेजाब से हमला करने वाले लोग अपनी जिंदगी मस्त तरीके से जी रहे थे.


पुरुष प्रधान समाज की जिद

पुरुष प्रधान समाज हमेशा यह जिद क्यों करता है कि जो उसे पसंद आ जाए वो किसी भी कीमत पर उसकी होनी चाहिए. पुरुष प्रधान समाज को यह हक किसने दिया कि वो यह तय करे कि जो महिला उसकी नहीं हुई वो किसी और की भी नहीं होगी. समाज में महिलाओं की स्थिति ऐसी है कि हर पुरुष उसे अपनी जागीर समझता है. जब भी कोई महिला अपने हक के लिए लड़ने निकलती है तो समाज उसी पर अंगुली उठाता है क्यों? यह सब ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब यह पुरुष प्रधान समाज कभी भी नहीं दे सकता है क्योंकि मर्दवादी समाज के पास ऐसा मानसिक स्तर ही नहीं है जो महिला को अपनी जागीर समझने के बदले अपने बराबर का सम्मान देना उचित समझे.


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Tags: women empowerment, women empowerment in India, women and society in india, नारी, महिला, औरत की सुन्दरता, पुरुष समाज



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