स्त्री दर्पण

Women Development and Empowerment

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इस भारतीय बेटी की दिलेरी ने बचाई कई अमेरिकी जानें

Posted On: 19 Dec, 2015  
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के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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के द्वारा: jlsingh jlsingh

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बहुत सही लिखा है आपने…वेश्यावृत्ति के केंद्र में महिला नहीं पुरुष ही होता है…पुरुषों की लोलुप निगाहों की प्यास बुझाने के लिए कभी किसी महिला को जबरदस्ती इसमें धकेल दिया जाता है तो कभी वह खुद अपनी जिंदगी की सांसे चलने के लिए खुद को इसमें झोंक देती है. लेकिन केंद्र में हमेशा महिला ही नजर आती है…उस पुरुष को कोई वेश्या नहीं बोलता जो इसमें बराबर का शरीक होता है. अगर वह वेश्या कई पुरुषों के साथ सोती है और वेश्या कहलाती है तो उस पुरुष को भी वेश्या ही कहा जाना चाहिए जो जाने कितनी महिलाओं के साथ सोता है जिसे वह वेश्या कहता है…मुद्दे कई हैं पर केंद्र में वेश्या कहलाने का यह मुद्दा सबसे ज्यादा दर्दनाक है…

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आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया

के द्वारा: ऋषभ शुक्ला ऋषभ शुक्ला

आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया

के द्वारा:

धन्यवाद सुमित कि आपने अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया हमें दी. जानकर अच्छा लगता है कि जब किसी सेंसिटिव इशू पर लोग सोचते हैं और उसे शेयर करते हैं. आपकी सोच आपकी है पर यह दायरों में बंधी लगती है. आप कानून नहीं हिंदुत्व देख रहे हैं. अगर मैं पूछूँ हिंदुत्व है क्या तो यहां यह बहस बेमानी क्योंकि बात तो एक सामाजिक व्यवस्था को सही रूप से चलाने का है जिसके लिए कानून जरूरी है. मुस्लिम का कानून कहां का है, क्रिस्चियन का कहां बना, किसने बनाया है उससे आपको क्यों फर्क पड़ता है मेरी समझ से बाहर है. मुझे जहां तक पता है 'गीता' हिंदुओं का पवित्र ग्रंथ है और उसमें कहा गया है "पाप से नफरत करो, पापी से नहीं". इसके अलावे और भी कई बातें हैं जो हिंदू धर्म सिखाती है. बाकी की बातें छोड़ो, आप बस इतना बताओ आप इस पाप और पापी के कॉंसेप्ट को फॉलो करते हो? हिंदुत्व की ऐसी कोई भी अच्छी बात बताओ जो आप अपने जीवन में सचमुच करते हो, प्रैक्टिकल में भी मानते हो. धोती-कुरता पहनकर आप नहीं चलते, कम्फर्ट शर्ट-पैंट में है, फिर जब कानून की बात आती है तो सभी पश्चिम-पूरब, धर्म-कर्म की बात क्यों करने लगते हैं भाई. हमारे धर्म में तो बेटियों को लक्ष्मी माना जाता है पर हकीकत में कितना मान होता है वो तो आप खुद ही समझ सकते हैं. आप देवी मानकर दुर्गा की पूजा कर खुद को धन्य समझते हैं पर अपनी पत्नी की बात मानना शायद अहं का मुद्दा हो. 'गणपति बप्पा मौर्या' बहुत श्रद्धा से बोलेंगे पर वे गण्पति बप्पा अपने माँ-बाप को संसार मानते थे आप इसका कितना पालन करते है. हर धर्म बहुत पवित्र है क्योंकि धर्म हमें सुशिक्षा देने के लिए हमें सही रास्ता दिखाने के लिए बनाए गए. हमारा हिंदू धर्म भी बहुत पवित्र है. पर यह जरूर कहना चाहेंगे कि जैसे पॉलिटिक्स आज नेता अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने लगे हैं वैसे ही हम धर्म अपनी खामियां छुपाने के लिए इस्तेमाल करने लगे हैं. वरना हमारा तो यही मानना है कि कानून तो कानून है, देश और समाज को सही ढ़ंग से चलाने का एक माध्यम. मतलब तो कानून से है, इसकी प्रेरणा कहां से ली गई इससे आपको फर्क क्यों पड़ता है आखिर? जिस मकसद से इसे बनाया जा रहा उसे देखो ना.

के द्वारा: Women Empowerment Women Empowerment

एतिहासिक परम्परा के साथ छेड़ छाड़ करना किसी भी सूरत में ठीक नहीं है। यह एक पब्लिसिटी स्टंट है और कुछ नहीं। यह देखने और कहने में बहूत अच्छा लगता है लेकिन वास्तव में इसके भावी परिणाम अच्छे नहीं होंगे। जहाँ तक इज्जत का सवाल है वो महिला हो या पुरुष उसे अपने आचरण से ही इज्जत मिलती है। और जहाँ तक भ्रूण हत्या रोकने की बात है इसको रोकने के और भी कारगर तरीके हो सकते हैं। अगर यह परम्परा चलानी ही है तो इकलोती लड़कियों को उन लड़कों से शादी कर लेनी चाहिए जो अनाथ हैं, और जिनका आगे पीछे नहीं है। उन्हें केवल उनसे शादी ही नहीं करनी चाहिए बल्कि उनको काम धंधा भी खुलवा कर देना चाहिए, ताकि वो आपनी जिन्दगी मैं सेटल हो सकें। और जहाँ तक वंश की बात है वंश भी पति का ही चलाना चाहिए ताकि उसे ऐसा न लगे की मैं अनाथ हूँ मेरी ओलाद का पिता हो कर भी मेरा सर नेम उसके साथ नहीं लगता। ऐसे पुरषों को सम्मान दे कर सम्मान लेने में कोई बुरे नहीं। जिस प्रकार वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं और सरोवर भी अपना पानी स्वयं नहीं पीता है। उसी तरह एक महिला को जिसे इश्वर नें संतान को जनम देने का वरदान दिया है को अपने इस वरदान का उपयोग अपने पति का वंश चलाने के लिए ही करना चाहिए न की स्वार्थवश अपनी महानता साबित करने की लिए। ऐसा हमें प्रकृति भी सिखाती है कि अपनी शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग खुद के लिए न करके दूसरों के लिए करो। अगर कोई व्यक्ति स्वार्थी हो जाये या यश और कीर्ति के चक्कर में पड़ जाये तो वो मानव उचतम स्थान पा कर भी निम्न दर्जे का ही होता है। समाज में महिला का दर्जा स्वार्थी का नहीं होना चाहिए। अगर महिला चाहे तो आपने अच्छे आचरण से आपने ससुराल पक्ष को खुश रखते हुए आपने माँ बाप की सेवा कर सकती है और इसमें उसका पति भी सहर्ष उसकी मदद करेगा। केवल अपने फायदे के लिए अपने हिसाब से किसी को घर जमाई बनाना और परम्परा को तोडना अच्छी बात नहीं है।

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सन १९८९ में शुरू किये गए महिला समाख्या योजना के बारे में इस लेख में विस्तार से पढने को मिला और साथ ही यह जानकर बड़ी ख़ुशी हुयी ,की यह योजना दस राज्यों में कार्यरत है और इससे महिलावों के जीवन स्तर में बहुत सुधार हुवा है लेकिन इसमें राज्यों के नाम नहीं लिखे गए जहाँ यह लाभ पहुंचा है या नहीं, इसकी भी जानकारी हो सके इसलिए लेखक से मेरा आग्रह है की उन राज्यों के नाम उजागर करने की कृपा करें अब रही बात महिलाओं को कितना लाभ मिला है सैश्निक एवं ब्यवहारिक और क्या सचमुच महिलाओं के प्रति ब्यवहार में कोई विशेस प्रगति नजर आई है क्यूंकि यह कहानी कुछ यूँ शुरू हुयी की कोई लड़की जब छोटी थी तो उसका भाई कहे करता था की तू कितनी भी पढाई कर ले तू कदी पुरुषों कि बराबरी ना कर सकती और इसी बात को सुनकर उसने महिला समाख्या योजना की जानकारी ली और अब उसका लाभ उठा रही है अब मेरा सवाल यह है की जब ये योजना आज से २४ साल पहले से लागू है फिर जो महिलाओं को उनका अधिकार दिला रहा है फिर आज महिला इतनी विचारी क्यूँ दीख रही है? और उसके साथ इतने जुलम क्यों हो रहे हैं ? क्या इसकी जानकारी भी है "मैं लाऊँगी बदलाव देखेगा जमाना " लेख लिखने वाले को क्या उसको दिल्ली की हाल की घटना की जानकारी नहीं या फिर नित नए बलात्कार की घटना आज सारे देश में हो रही है उसके बारे में क्या कहना है इस लेखक का . मेरे विचार से- ऐसे बदलाव तब तक नहीं आने वाले जब तक हमारी सामजिक सोंच में बदलाव नहीं आता सरकारी योजनाओं से ऐसा कोई चमत्कार नहीं होनेवाला क्यूंकि ऐसी योजनायें कागज पर ज्यादा और जमीं पर कम ही होते है और उनका लाभ भी अपनी आबादी के अनुपात में नगण्य होता है अतः आज जरुरत है स्कूलों में चारित्रिक सिक्षा की और घरों में माता पिता द्वारा समान ब्यवहार करने की लड़का एवं लड़की दोनों के प्रति और सबसे जरुरी दहेज़ प्रथा की समाप्ति यह सारा दोष दहेज़ प्रथा का बने रहना ही है कुछ रसूख वाले लोग शादियों में इतना दिखावा करते हैं की दुसरे लोगों के मन में हीन भावना का जन्म होता है और वे भी येन केन प्रकारेण वैसा ही दिखावा अपनी बिटिया या बेटों की शादी में करने के लिए बेताब रहते हैं यह सब बदलना चाहिए और पैसे वालों को हिन् ये सब करना होगा जिनकी देखा देखि यह सब हो रहा है सबका सामर्थ्य कहाँ है ऐसे दिखावे के लिए पर कर्ज लेकर भी गरीब ज्यादा खर्च करना चाहता है अपनी बेटी के लिए अतः सुधार इन विषयों में होने चाहिए तभी यह सामाजिक कुरीति लड़की एवं लड़का में भेद भाव वाली मिट पायेगी.

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

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